राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल
राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ:
1. इतिहास का काल-विभाजन एवं मूल अवधारणाएँ
TABLE 1: इतिहास के तीन प्रमुख कालखंड
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क्र.सं. |
कालखंड |
पहचान/परिभाषा |
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1 |
प्रागैतिहासिक काल |
कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं; इतिहास का पुनर्निर्माण केवल पुरातात्विक सामग्री (उपकरण, मृद्भांड, संरचनाएँ) के आधार पर किया जाता है |
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2 |
आद्य-ऐतिहासिक काल |
लिपि का प्रयोग तो मिलता है, परन्तु वह अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है — उदाहरण: सिंधु घाटी सभ्यता |
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3 |
ऐतिहासिक काल |
पठनीय एवं व्याख्यायित लिखित सामग्री उपलब्ध है — उदाहरण: वैदिक काल |
राजस्थान में मानव-सभ्यता के आरंभिक चरण मुख्यतः पुरापाषाण, मध्यपाषाण एवं उत्तर-पाषाण (नवपाषाण) कालों से जुड़े हैं। यहाँ के प्राचीनतम निवासी हैण्डएक्स, क्लीवर व चॉपर जैसे पाषाण-उपकरणों का प्रयोग गंभीरी, बेड़च व चंबल नदियों की घाटियों में करते थे।
2. पुरातात्विक सर्वेक्षण की परंपरा एवं प्रमुख विद्वान
TABLE 2: राजस्थान में पुरातात्विक सर्वेक्षण से जुड़े प्रमुख नाम
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क्र.सं. |
विद्वान/संस्था (वर्ष) |
प्रमुख योगदान |
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1 |
अलेक्जेंडर कनिंघम (1864-65) |
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम महानिदेशक; बैराठ (विराटनगर — महाभारत में पांडवों के अज्ञातवास से सम्बद्ध स्थल) का प्रथम सर्वेक्षण एवं उत्खनन |
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2 |
ए.सी.एल. कार्लाइल (1871-73, 1882-83) |
विराटनगर (बैराठ), रंगमहल, कालीबंगा, नलियासर का सर्वेक्षण; ब्रह्मगिरी से कुल्हाड़ी/हस्तकुठार की प्राप्ति; राजपूताना के पाषाण-उपकरणों पर प्रथम प्रकाशन |
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3 |
सी.ए. हैकेट (1880-81) |
टोंक, बूँदी व जयपुर जिलों का सर्वेक्षण |
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4 |
एल.पी. टेस्सीटोरी, इटली (1916-19) |
बीकानेर रियासत में मूर्तियों व शिलालेखों का संग्रह-प्रलेखन; एशियाटिक सोसायटी की पत्रिका में प्रकाशन; कालीबंगा स्थल की सर्वप्रथम जानकारी देने वाले विद्वान |
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5 |
दयाराम साहनी (लगभग 1934) |
सांभर, नागरी, बैराठ में उत्खनन; मौर्य-गुप्त-कुषाण स्तरों की पहचान |
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6 |
अमलानंद घोष (1951-53) |
तत्कालीन महानिदेशक; घग्घर नदी घाटी का प्रथम विस्तृत सर्वेक्षण; 25 से अधिक पुरास्थलों की पहचान; सोथी (सोथी-सिसवाल) संस्कृति का नामकरण; कालीबंगा को हड़प्पा-सभ्यता से जोड़ने वाले प्रथम विद्वान |
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7 |
बी.बी. लाल एवं बी.के. थापर (1960-69) |
कालीबंगा का मुख्य उत्खनन (नौ उत्खनन सत्रों में); इससे पूर्व बी.बी. लाल द्वारा राजस्थान के पश्चिमी मंडल का सर्वेक्षण (लगभग 1953-54) — जिसमें नोह, गंभीरी व चंबल घाटियाँ शामिल थीं |
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8 |
एच.डी. साँकलिया (1954-56) |
आहड़ व बागोर संस्कृतियों का अध्ययन; डेक्कन कॉलेज, पुणे का नेतृत्व |
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9 |
वी.एन. मिश्र (1956 के पश्चात्) |
बागोर, गिलुंड, तिलवाड़ा, बैराठ में उत्खनन; 'बागोर संस्कृति' एवं 'लूनी उद्योग' का नामकरण; ग्रंथ — द स्टोन एज कल्चर्स ऑफ राजपूताना |
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10 |
रत्नचंद्र अग्रवाल एवं विजय कुमार |
नोह, बैराठ, जोधपुरा, सुनारी, गणेश्वर, नगर आदि अनेक स्थलों का उत्खनन |
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11 |
बी.बी. लाल, वी.एस. शिंदे, ग्रेगरी पोसेल (1993-2000) |
बालाथल का उत्खनन |
3. प्राक् एवं आद्य-ऐतिहासिक काल — भूवैज्ञानिक कालक्रम
TABLE 3: भूवैज्ञानिक अवधि, समय (BP) एवं तत्कालीन संस्कृति/उद्योग
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भूवैज्ञानिक अवधि |
समय (वर्तमान से पूर्व, BP) |
प्रचलित संस्कृति/उद्योग |
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प्लीस्टोसीन |
5,00,000 वर्ष पूर्व से |
निम्न पुरापाषाण — चॉपर, चॉपिंग उपकरण, हैण्डएक्स, क्लीवर |
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प्लीस्टोसीन |
50,000–20,000 वर्ष पूर्व |
मध्य पुरापाषाण — स्क्रेपर, बोरर, फलक (फ्लेक्स) |
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प्लीस्टोसीन |
20,000–10,000 वर्ष पूर्व |
उच्च पुरापाषाण — ब्लेड, ब्यूरिन |
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होलोसीन |
8,000–2,000 वर्ष पूर्व |
मध्यपाषाण/नवपाषाण — माइक्रोलिथ (लघुपाषाण उपकरण), ब्लेड |
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होलोसीन |
2,500–1,000 वर्ष पूर्व |
ताम्रपाषाणिक — विकसित हड़प्पा, आहड़, गणेश्वर-जोधपुरा |
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होलोसीन |
लगभग 1,000 वर्ष पूर्व से |
प्रारंभिक लौह युग — जोधपुरा, नोह, आहड़, गणेश्वर |
टिप्पणी: BP का अर्थ है 'वर्तमान (सन् 1950) से पूर्व'; अर्थात 10,000 BP लगभग 8,000 ई.पू. के समकक्ष माना जाता है।
4. पुरापाषाण काल (Palaeolithic)
TABLE 4: पुरापाषाण काल की उपसंस्कृतियाँ
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उपविभाग |
काल (वर्ष पूर्व) |
विशिष्ट उपकरण एवं तकनीक |
प्रमुख नदी-घाटियाँ |
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निम्न पुरापाषाण |
5,00,000–50,000 |
पेबुल (गोलाश्म), हैण्डएक्स (हस्तकुठार), क्लीवर (विदारणी), चॉपर-चॉपिंग; कच्चा माल मुख्यतः क्वार्टजाइट |
चंबल, बेड़च, गंभीरी, बनास, वागन, खारी, कोठारी, चंद्रभागा-कदमली |
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मध्य पुरापाषाण |
50,000–20,000 |
साइड व एण्ड स्क्रेपर, एक/द्वि-मुखी पॉइंट्स, बोरर, फलक (फ्लेक्स); लेवालोई एवं डिस्क-कोर तकनीक; कच्चा माल — चर्ट, जैस्पर, महीन दाने का ऐगेट; हैण्डएक्स-क्लीवर अपेक्षाकृत दुर्लभ |
लूनी बेसिन व पश्चिमी राजस्थान (सर्वाधिक सघनता); अरावली-पूर्वी क्षेत्र में वागन-कादमली व बनास-बेड़च तंत्र; चंबल घाटी (कोटा) |
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उच्च पुरापाषाण |
20,000–10,000 |
समानांतर पार्श्व ब्लेड-उत्पादन तकनीक; ब्लेड, ब्यूरिन, स्क्रेपर |
बूढ़ा पुष्कर व होकरा ('कारखाना स्थल'); मोगरा पहाड़ी (जोधपुर के निकट — तीनों चरणों व मध्यपाषाण का सम्मिलित स्थल); थार क्षेत्र में विरल किंतु हल्के उपकरण |
टिप्पणी: वी.एन. मिश्र द्वारा नामित 'लूनी उद्योग' (लगभग 45,000–25,000 वर्ष पूर्व) लूनी व उसकी सहायक नदियों — जोजरी, सुकड़ी, बांडी, लीलड़ी आदि — के क्षेत्र में एश्यूलियन परंपरा से विकसित माना जाता है। उपलब्ध साक्ष्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि तत्कालीन मानव अग्नि-प्रयोग की तकनीक जान चुका था, किंतु पहिये से अभी अपरिचित था।
TABLE 5: पुरापाषाणकालीन कुछ उल्लेखनीय स्थलों की सूची
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उपविभाग |
उल्लेखनीय स्थल |
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निम्न पुरापाषाण |
चित्तौड़गढ़ (एस.आर. राव द्वारा खोजे गए 6 स्थल), नगरी, हरिपुरा (बामनी नदी तट), सिगाड़ (कादमली नदी तट, निम्बाड़ा के निकट — यहाँ चैल्सीडोनी व ऐगेट के लघु-उपकरण मिले हैं), ताजपुरा (रूपारेल नदी तट), मंडपिया/भीलवाड़ा (वी.एन. मिश्र द्वारा खोज), भानगढ़-अलवर (के.वी. सौन्दरराजन द्वारा सर्वेक्षित; यहाँ एब्बेवेलियन-एश्यूलियन से लेवालोजियन तकनीक की ओर विकास के प्रमाण मिलते हैं), होकरा (पुष्कर के निकट), बीगोद, देवली, नागद्वारा, भैंसरोड़गढ़, नवाघाट |
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मध्य पुरापाषाण |
धनेता, हाजीखेड़ी, भूटिया, ब्यावर, चंपाखेड़ी |
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उच्च पुरापाषाण |
नगरी, खोर, ब्यावर, खेड़ा, बड़ी, अचनेरा, देवड़ी, बल्लू खेड़ा, भैंसरोड़गढ़, नवाघाट, हमीरगढ़, स्वरूपगंज, बीगोद, मंडपिया, जहाजपुर, खुरियास, देवली, गोगुंदा, दुरिया, गोगोखेड़ा, पुर, पाटन, गिलुंड, लूनी, सिंगारी व पाली (गुहिया व बांडी नदी तट), समदड़ी, धनेरी |
5. मध्यपाषाण काल (Mesolithic) — बागोर एवं तिलवाड़ा
राजस्थान में लघुपाषाण (माइक्रोलिथ) उपकरणों की खोज का श्रेय सर्वप्रथम ए.सी.एल. कार्लाइल को विंध्य श्रेणी के सन्दर्भ में जाता है। राज्य में मुख्यतः दो क्षेत्रों — मेवाड़ मैदान (दक्षिण-पूर्वी राजस्थान) तथा निचला लूनी बेसिन (पश्चिमी राजस्थान) — में समृद्ध मध्यपाषाणकालीन स्थल (जैसे निंबाहेड़ा, बागोर व मंडपिया) मिले हैं।
TABLE 6: मध्यपाषाण काल के दो प्रमुख स्थल
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पुरास्थल |
जिला/नदी |
उत्खनन विवरण |
प्रमुख विशेषताएँ |
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बागोर |
भीलवाड़ा; कोठारी नदी तट |
तीन चरणों में उत्खनन — 1967 (वी.एन. मिश्र व एल.एस. लैशनिक, हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय), 1968 (डेक्कन कॉलेज पुणे व राजस्थान सरकार का संयुक्त कार्य), 1968-69 (वी.एन. मिश्र व विजय कुमार) |
कार्बन-14 तिथियाँ लगभग 4480 ई.पू. से 200 ई. तक; तीन सांस्कृतिक प्रावस्थाएँ; 5 मानव कंकाल प्राप्त — विभिन्न प्रावस्थाओं में शव को भिन्न-भिन्न दिशा व मुद्रा में दफनाने की प्रथा; मनकों का हार, ताँबे का लटकन व मृद्भांड शव के साथ रखे जाने के प्रमाण — पुनर्जन्म में विश्वास का संकेत; प्रावस्था-1 में मृद्भांड अनुपस्थित, प्रावस्था-2 में हस्तनिर्मित लाल मृद्भांड, प्रावस्था-3 में चाक-निर्मित टिकाऊ मृद्भांड; आभूषणों में फेल्सपार, कार्नेलियन व काँच के मनके; भारत में भेड़-बकरी पालन का प्राचीनतम साक्ष्य (लगभग 5000 ई.पू.) यहीं से मिलता है |
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तिलवाड़ा |
बाड़मेर (पचपदरा तहसील); लूनी नदी तट |
उत्खनन 1967-68 (राजस्थान राज्य पुरातत्व व संग्रहालय विभाग + डेक्कन कॉलेज, पुणे) |
तीन सांस्कृतिक चरण — प्रथम चरण विशुद्ध मध्यपाषाणिक (लगभग 3 मीटर व्यास में पत्थरों की गोलाकार चक्रीय रचना, संभवतः झोपड़ियों के फर्श); द्वितीय चरण में चाक-निर्मित धूसर व लाल मृद्भांड; पालतू व जंगली दोनों प्रकार के पशु-अवशेष प्राप्त; उपकरण-सामग्री — चर्ट, कैल्सीडोनी, क्वार्टजाइट, रायोलाइट; बागोर से भिन्नता — यहाँ 'पेटिट ट्रांशेट' (लघु छेनीनुमा उपकरण) का अभाव तथा उपकरणों में उतनी विविधता नहीं मिलती |
मध्यपाषाणकालीन उपकरण प्रायः ज्यामितीय आकृति के होते थे — जैसे कुंठित-पृष्ठ ब्लेड (ब्लंटेड बैक्ड ब्लेड), तिरछी कुंठित ब्लेड, त्रिभुज, अर्धचंद्राकार (ल्यूनेट्स), समलंब (ट्रेपेज़) तथा पेटिट-ट्रांशेट — इनका आकार सामान्यतः 1 से 5 मिमी तक ही होता था।
6. ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ (Chalcolithic)
तीसरी-दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. के इस कालखंड में ताँबे व पत्थर, दोनों प्रकार के उपकरण साथ-साथ प्रयोग किए जाते थे। गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति की व्यापकता के कारण राजस्थान को प्रायः 'भारत में ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी' कहा जाता है।
TABLE 7: राजस्थान की प्रमुख ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ एवं स्थल
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स्थल (जिला) |
नदी |
उत्खनन वर्ष/उत्खननकर्ता |
प्रमुख तथ्य |
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गणेश्वर |
सीकर (नीमकाथाना तहसील) |
कांतली नदी; उत्खनन 1977-79, रत्नचंद्र अग्रवाल |
1000 से अधिक ताम्र-उपकरण (तीर, भाले, मछली-काँटे, चूड़ियाँ) प्राप्त; हड़प्पा सभ्यता को ताँबे की आपूर्ति का प्रमुख स्रोत माना जाता है; काल लगभग 2800-2200 ई.पू. |
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आहड़ (ताम्रवती नगरी/धूलकोट) |
उदयपुर; आयड़/बनास नदी |
एच.डी. साँकलिया, अक्षयकीर्ति व्यास, वी.एन. मिश्र; उत्खनन 1953-54, 1961-62 |
काला-व-लाल मृद्भांड (BRW); काल लगभग 2000-1500 ई.पू.; ताँबा गलाने की 6 भट्टियाँ; धान-गेहूँ-जौ की कृषि; विदेशी व्यापार के प्रमाण |
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गिलुंड |
राजसमंद; बनास नदी |
बी.बी. लाल; उत्खनन 1957-58 |
बनास संस्कृति का प्रतिनिधि स्थल; पक्की ईंटों का प्रयोग (जो आहड़ में सामान्यतः नहीं मिलता); काल लगभग 2000-1700 ई.पू. |
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बालाथल |
उदयपुर; बनास नदी |
वी.एन. मिश्र, वी.एस. शिंदे, ग्रेगरी पोसेल, डेक्कन कॉलेज; उत्खनन 1993-2000 |
प्राचीन नाम ताम्रवती; पत्थर-मिट्टी की किलेबंदी; लगभग 22 सांस्कृतिक प्रावस्थाएँ; काल लगभग 3000-1500 ई.पू.; दालानयुक्त भवन-रचना |
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ओझियाना |
भीलवाड़ा; कोठारी नदी |
बी.आर. मीणा, एस.सी. गुप्ता, आलोक त्रिपाठी; उत्खनन 1999-2000 |
आहड़ संस्कृति से सम्बद्ध; मृण्मूर्तियाँ व ताँबा गलाने की भट्टियाँ प्राप्त |
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पछमता |
राजसमंद; बनास नदी |
गिलुंड के निकट |
आहड़-बनास संस्कृति से सम्बद्ध; ताम्र-भट्टियों के प्रमाण; काल लगभग 2350-1800 ई.पू. |
TABLE 8: आहड़ संस्कृति — विशेष बिंदु
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पक्ष |
विवरण |
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अन्य नाम |
बनास संस्कृति, धूलकोट, ताम्रवती नगरी, आघाटपुर ('आघाट दुर्ग') |
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आवास |
पत्थर व मिट्टी से निर्मित मकान; चिकनी मिट्टी का फर्श; कई कमरे; चूल्हों की व्यवस्था (कुछ मकानों में 6 चूल्हे तक मिले हैं) |
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कृषि |
धान, गेहूँ व जौ की खेती; ताँबा गलाने की 6 भट्टियाँ; विदेशी व्यापार के साक्ष्य |
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मृद्भांड एवं कला |
काला-व-लाल मृद्भांड (उल्टी भट्टी में पकाया गया); श्वेत रंग से अलंकरण; तगारी व मृण्मूर्तियाँ (बैल-गाय की आकृतियाँ) |
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मुद्रा |
रोमन सम्राट क्लॉडियस के सिक्के प्राप्त — विदेशी व्यापार का संकेत |
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कालक्रम |
लगभग 4000 वर्ष पुरानी बस्ती; तीन सांस्कृतिक कालखंडों में विभाजित |
7. सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता एवं कालीबंगा
राजस्थान में हड़प्पा-सभ्यता के अवशेष मुख्यतः घग्घर नदी (प्राचीन सरस्वती) के तटवर्ती क्षेत्र में मिले हैं। यह नदी कभी सतलुज व यमुना के मध्य बहती हुई इस क्षेत्र को सींचती थी।
TABLE 9: कालीबंगा — प्रमुख तथ्य
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पक्ष |
विवरण |
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स्थिति |
हनुमानगढ़ जिला; घग्घर नदी (प्राचीन सरस्वती) के बाएँ तट पर |
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नामकरण |
स्थल पर बड़ी संख्या में मिली काले रंग की (टेराकोटा) चूड़ियों के अवशेषों के कारण 'कालीबंगा' (काली चूड़ियाँ) नाम पड़ा |
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प्रारंभिक पहचान |
इटैलियन विद्वान लुइजी पियो टेस्सीटोरी द्वारा सर्वप्रथम स्थल की जानकारी (लगभग 1917-19); बाद में अमलानंद घोष ने अपने 1951-53 के सर्वेक्षण में इसे हड़प्पा-सभ्यता से सम्बद्ध स्थल के रूप में चिन्हित किया |
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मुख्य उत्खनन |
1960-69 (नौ उत्खनन सत्र) — प्रारंभ में बी.बी. लाल के निर्देशन में, बाद में बी.के. थापर के नेतृत्व में; एम.डी. खरे, के.एम. श्रीवास्तव व एस.पी. जैन का भी योगदान |
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सांस्कृतिक चरण |
दो प्रमुख चरण — कालीबंगा-I (प्राक्-हड़प्पा/प्रारंभिक हड़प्पा) व कालीबंगा-II (विकसित/परिपक्व हड़प्पा) |
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नगर-योजना |
दो टीले — पश्चिमी छोटा टीला (गढ़ी/दुर्ग भाग) व पूर्वी बड़ा टीला (निचला नगर); सुनियोजित ग्रिड-पद्धति की गलियाँ; कच्ची मिट्टी की ईंटों के मकान |
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विशिष्ट खोजें |
विश्व का प्राचीनतम ज्ञात जुताई किया हुआ खेत (समकोण पर काटती हुई कूँडों की पंक्तियाँ, बहु-फसली खेती का संकेत); अग्नि-वेदिकाओं की पंक्ति (एक स्थान पर सात अग्निकुंड, पशु-अस्थियों सहित); तीन प्रकार के शवाधान (पूर्ण शव, कलश, प्रतीकात्मक शवाधान); बेलनाकार मुद्राएँ; मेसोपोटामिया-शैली की मृद्-सामग्री (व्यापारिक संपर्क का संकेत) |
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पतन का कारण |
अधिकांश विद्वान घग्घर (सरस्वती) नदी के सूख जाने को बस्ती के परित्याग का मुख्य कारण मानते हैं (कार्बन-तिथियों के अनुसार लगभग 2650 ई.पू. के आसपास) |
टिप्पणी: घग्घर घाटी में कालीबंगा के अतिरिक्त बरोर (अनूपगढ़, श्रीगंगानगर) जैसे अन्य हड़प्पाकालीन स्थल भी चिन्हित किए गए हैं।
8. लौहयुगीन संस्कृति
TABLE 10: राजस्थान के प्रमुख लौहयुगीन स्थल
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स्थल (जिला) |
नदी |
उत्खनन वर्ष/उत्खननकर्ता |
प्रमुख तथ्य |
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नोह |
भरतपुर; रूपारेल नदी |
रत्नचंद्र अग्रवाल; उत्खनन 1963-64 (छह सांस्कृतिक चरण) |
काला-व-लाल मृद्भांड (BRW) व चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) दोनों प्राप्त; पाँच सांस्कृतिक स्तर; एक विशाल यक्ष-प्रतिमा प्राप्त; OCP–PGW–शुंग–कुषाणकालीन अनुक्रम |
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बैराठ/विराटनगर |
कोटपूतली-बहरोड़; बाणगंगा नदी |
कनिंघम, कार्लाइल, दयाराम साहनी, नीलरत्न बनर्जी आदि द्वारा विभिन्न कालों में उत्खनन |
मत्स्य जनपद की राजधानी; मौर्य सम्राट अशोक का भाब्रू शिलालेख यहीं से प्राप्त; गोलाकार बौद्ध स्तूप-मंदिर; चाँदी की पंचमार्क मुद्राओं (36) व इंडो-ग्रीक सिक्कों (8) की प्राप्ति; भीम की डूँगरी व बीजक की पहाड़ी प्रमुख उप-स्थल |
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सुनारी |
सीकर (नीमकाथाना) |
कांतली नदी क्षेत्र; उत्खनन 1980 |
आहत सिक्के व प्राचीनतम लौह-गलाने की भट्टियों के साक्ष्य; PGW व शुंग-कुषाणकालीन अवशेष; भारत में लौह-प्रगलन के प्राचीनतम प्रमाणों में गिना जाता है |
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जोधपुरा |
जयपुर (कोटपूतली); साबी नदी |
विजय कुमार व वी.एन./बी.एन. मिश्र; उत्खनन 1972-73 |
ताम्रयुगीन से लेकर मौर्य-शुंग-कुषाण काल तक निरंतर बस्ती; ताम्र-मृण्मूर्तियाँ; काल लगभग 1200 ई.पू. |
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रैढ़ |
टोंक; ढूँढाड़/बीसलपुर क्षेत्र |
कार्लाइल, दयाराम साहनी, केदारनाथ पुरी; उत्खनन 1938-40 |
'भारत का टाटानगर' कहा जाता है (लौह-उपकरणों की बहुलता के कारण); लगभग 3075 आहत मुद्राएँ प्राप्त — अब तक की सर्वाधिक संख्या; ब्राह्मी अभिलेख; मालव जनपद से सम्बद्ध |
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नगर/कर्कोट |
टोंक |
श्रीकृष्ण देव; उत्खनन 1943-44 |
मालव जनपद की संभावित राजधानी; लगभग 6000 मालव सिक्के प्राप्त — भारत में मालव मुद्राओं का सबसे बड़ा संग्रह |
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सांभर |
जयपुर; सांभर झील |
नलियासर संस्कृति से सम्बद्ध |
यौधेय, इंडो-ग्रीक, कुषाण व गुप्तकालीन सिक्के प्राप्त |
9. प्रमुख सभ्यताएँ तथा उनकी विशेषताएँ
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क्र.सं. |
सभ्यता |
प्रमुख तथ्य |
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1 |
आहड़ सभ्यता के नाम, युग, नदी, संस्कृति, विशेषताएँ, उत्खनन व नगर-योजना क्या हैं |
प्राचीन नाम: ताम्रवती, आघाटपुर/आघाट दुर्ग; स्थानीय नाम धूलकोट (टीला ~1500 फीट लम्बा, ~45 फीट ऊँचा)। युग: ताम्रपाषाण (चालकोलिथिक)। नदी: आयड़/बेड़च (बनास नदी-प्रणाली)। संस्कृति: आहड़/बनास संस्कृति (समग्र काल लगभग 3000–1500 ई.पू.; समृद्ध काल 1900–1200 ई.पू. — डॉ. गोपीनाथ शर्मा)। तथ्य: सिन्धु घाटी सभ्यता का भाग नहीं; धूप में सुखाई कच्ची ईंटें; ‘गोरे व कोठ’ (अनाज भण्डारण के मृत्पात्र); छपाई-रंगाई व चावल से परिचित; ताँबा गलाने की भट्टियाँ (अर्थव्यवस्था ताम्र-प्रधान)। मुद्राएँ: ताँबे की 6 मुद्राएँ व 3 मुहरें (तीसरी–प्रथम सदी ई.पू.); एक मुद्रा पर एक ओर त्रिशूल, दूसरी ओर यूनानी देवता अपोलो। नगर-योजना: 8 सांस्कृतिक स्तर; पत्थर की नींव वाले बड़े मकान (कमरे 33×20 फीट तक), बाँस-बल्लियों की छतें, काली मिट्टी-बालू मिश्रित फर्श; एक ही घर में अनेक चूल्हे (संयुक्त बड़े परिवार/सामूहिक भोजन के संकेत)। उपकरण: ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, चूड़ियाँ आदि; स्फटिक (क्वार्ट्ज) व चर्ट के लघु उपकरण। उत्खनन: अक्षयकीर्ति व्यास (1953), रत्नचन्द्र अग्रवाल (1956), प्रमुख उत्खनन — एच.डी. सांकलिया (1961-62, डेक्कन कॉलेज)। स्थान: उदयपुर नगर से ~3 किमी। |
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2 |
कालीबंगा सभ्यता की सम्पूर्ण विशेषताएँ |
नामकरण: काली + बंगा (पंजाबी में चूड़ी) = काली चूड़ियों की प्रचुरता से। काल: प्राक्-हड़प्पा चरण ल. 3500–2500 ई.पू.; परिपक्व हड़प्पा चरण ल. 2500–1750 ई.पू.। नदी: घग्घर (प्राचीन सरस्वती) का बायाँ तट; टीला ~12 मी ऊँचा। खोज: सर्वप्रथम पहचान एल.पी. टेस्सीटोरी (1916-18); 1952 में अमलानन्द घोष ने हड़प्पाकालीन स्थल के रूप में चिह्नित किया। प्रमुख विशेषताएँ: विश्व का प्रथम जुता हुआ खेत (चना व सरसों की दोहरी फसल-पद्धति); 7 अग्नि वेदिकाएँ (पंक्तिबद्ध); प्रतिच्छेदी वृत्तों से अलंकृत ईंटों का फर्श; भूकम्प का प्राचीनतम पुरातात्विक साक्ष्य (~2600 ई.पू.); बैलगाड़ी के खिलौने; पत्थर के बाट; कच्ची ईंटों का परकोटा; लोहे से अपरिचित। नगर-योजना: दो सांस्कृतिक काल (प्राक्-हड़प्पा बस्ती के 5 संरचनात्मक स्तर); मार्ग उत्तर-दक्षिण व पूर्व-पश्चिम; कच्ची ईंटें 30×15×7.5 सेमी; पक्की ईंटों का प्रयोग कुओं-नालियों में; पश्चिमी टीला दुर्ग-क्षेत्र। मृद्भाण्ड: लाल रंग, काली-सफेद रेखांकन; सैन्धव लिपि (अपठित)। उत्खनन: बी.बी. लाल, बी.के. थापर, जे.पी. जोशी, एम.डी. खरे आदि (1960-61 से 1968-69, नौ सत्र)। जिला: हनुमानगढ़ (~25 किमी)। |
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3 |
बैराठ (विराटनगर) की विशेषताएँ |
प्राचीन नाम: विराटनगर — मत्स्य जनपद की राजधानी। घटनाएँ: पाण्डवों के अज्ञातवास की परम्परा; हूण शासक मिहिरकुल द्वारा विध्वंस (6ठी सदी ई.)। बौद्ध अवशेष: बीजक की पहाड़ी पर अशोककालीन गोल बौद्ध मंदिर/चैत्यगृह (भारत का प्राचीनतम गोल मंदिर; लकड़ी के किवाड़ों के साक्ष्य) व स्तूप; हीनयान परम्परा; स्वर्ण मंजूषा (कलश); बौद्ध मठ। अशोक स्तम्भ: चूनार के पालिशदार पत्थर के टुकड़े। लिपि: शंख लिपि के अभिलेख। सिक्के: 36 चाँदी के सिक्के — 8 पंचमार्क (आहत) + 28 हिन्द-यूनानी (इनमें 16 मिनेण्डर के)। शिलालेख: अशोक का भाब्रू (बैराठ-कलकत्ता) लघु शिलालेख — कैप्टन बर्ट द्वारा बीजक की पहाड़ी से खोज (1837); अब एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता में। मृद्भाण्ड: NBPW का राजस्थान में प्रमुख स्थल; PGW व त्रिरत्न-स्वस्तिक अंकित मृद्भाण्ड भी। अन्य: सूती वस्त्र के अवशेष; काल ल. 250 ई.पू.–50 ई. (मुख्य बस्ती)। उत्खनन: दयाराम साहनी (1936-37; रिपोर्ट ‘Excavations at Bairat’); पुनः नीलरत्न बनर्जी व कैलाशनाथ दीक्षित (1962-63)। जिला: कोटपूतली-बहरोड़; नदी: बाणगंगा। |
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गणेश्वर सभ्यता की विशेषताएँ |
उपनाम: ‘ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी’, ताम्र-संचयी संस्कृति, ‘पुरातत्व का पुष्कर’। काल: रेडियोकार्बन तिथि ल. 2800 ई.पू. (ताम्रयुगीन)। नदी: कांतली (उद्गम-क्षेत्र, खेतड़ी के निकट)। मृद्भाण्ड: गेरुए रंग के (OCP)/कपिषवर्णी — काली-नीली रेखांकन सहित। महत्व: सर्वाधिक ताम्र सामग्री; सिन्धु घाटी के स्थलों को ताँबे की आपूर्ति; ईंटों का प्रयोग नहीं। खोज-उत्खनन: खोज 1972; उत्खनन आर.सी. (रत्नचन्द्र) अग्रवाल व विजय कुमार (1977-78)। जिला: सीकर (नीम का थाना तहसील)। |
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5 |
बागोर सभ्यता की विशेषताएँ |
काल: तीन चरण — प्रथम (मध्यपाषाण) ल. 5000 ई.पू. से; द्वितीय (ताम्र) ल. 2800 ई.पू. से; तृतीय (लौह/आरंभिक ऐतिहासिक) ल. 600-500 ई.पू. से। नदी: कोठारी (बनास की सहायक)। प्रमाण: भारत में पशुपालन के प्राचीनतम प्रमाण; ‘महासती टीले’ से अवशेष; गाय, बैल, मृग, सुअर आदि की अस्थियाँ। उपकरण: स्फटिक (क्वार्ट्ज) व चर्ट/जैस्पर के लघुपाषाण उपकरण (microliths); 5 ताम्र उपकरण (छेद वाली सुई, कुन्ताग्र, त्रिभुजाकार शस्त्र)। शवाधान: शव आवास के भीतर/निकट गाड़े जाते थे; प्रारम्भिक चरण में टाँगें मोड़कर, परवर्ती चरण में सीधे; साथ में मनके व ताम्र लटकन। आभूषण: अकीक (agate), कार्नेलियन व काँच के मनके। मृद्भाण्ड: द्वितीय चरण में हस्तनिर्मित, तृतीय में चाक-निर्मित। उत्खनन: वी.एन. मिश्र व एल.एस. लेशनिक (1967-70) — डेक्कन कॉलेज (पुणे) + राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग। जिला: भीलवाड़ा। |
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6 |
नोह की विशेषताएँ |
अवशेष: 5 सांस्कृतिक युग; राजस्थान में लौह-प्रयोग के प्राचीनतम प्रमाणों में (ल. 1100 ई.पू.); महाभारतकालीन परम्परा से सम्बद्ध। मृद्भाण्ड: काले-लाल (BRW) — तश्तरियाँ, घड़े; PGW का प्रमुख स्थल; मौर्य स्तर में NBPW; मृद्भाण्डों पर कपड़े की छाप (1100-600 ई.पू. में बुनाई ज्ञात)। जल-निकास: गोलाकार ‘रिंग-वेल्स’ (एक ही स्थान से 16)। प्रतिमा: ‘जाखबाबा’ —विशाल यक्ष प्रतिमा (~9 फीट/2.7 मी); मौर्य, कुषाण व गुप्तकालीन मूर्तियाँ भी। नदी: रूपारेल। उत्खनन: रतनचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में, 1963-64 से (कई सत्र)। जिला: भरतपुर। |
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रैढ़ की विशेषताएँ |
उपनाम: ‘राजस्थान का टाटानगर’ (विशाल लौह-उद्योग के कारण)। सिक्के: 3075 पंचमार्क (आहत) सिक्के — एक ही स्थल से प्राप्त विशालतम निधियों में से; ~300 मालव सिक्के; 1 सिक्का यूनानी शासक अपोलोडोट्स का। मूर्तियाँ: शुंगकालीन यक्षी प्रतिमा; गेरू-रंग से रंगी मातृदेवी मृण्मूर्तियाँ। लौह-केन्द्र: तलवार, खंजर, भाले, चाकू, कुल्हाड़े आदि; धातु-शोधन के साक्ष्य। रिंग-वेल्स: ~115 (के.एन. पुरी की रिपोर्ट)। अन्य: ब्राह्मी लिपि की मिट्टी की मुहर। नदी: ढील। जिला: टोंक। उत्खनन: के.एन. पुरी (1938-39 व 1939-40), दयाराम साहनी के निर्देशन में। |
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नगरी (मध्यमिका) की विशेषताएँ |
प्राचीन नाम: मध्यमिका (महाभारत व पतंजलि के महाभाष्य में उल्लिखित; सिक्कों पर ‘मज्झमिकाय शिविजनपदस’)। राजधानी: शिवि जनपद की। अन्य: सिंचाई-नहर के अवशेष; बौद्ध अवशेष भी। नदी: बेड़च। जिला: चित्तौड़गढ़। सर्वेक्षण-उत्खनन: सर्वप्रथम कार्लाइल (1871-72); उत्खनन डी.आर. भंडारकर (1915-16; रिपोर्ट 1920 में प्रकाशित — इसी से ‘1919-20’ की भ्रांति); बाद में के.वी. सौंदरराजन (1961-62)। |
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9 |
नगर के प्राचीन नाम, सिक्के एवं महत्व |
प्राचीन नाम: मालव नगर/कर्कोट नगर (उनियारा के निकट)। सिक्के: ~6000 मालव सिक्के (कार्लाइल द्वारा 1871-72 में संकलित)। उत्खनन: कृष्ण देव (1942-43)। अन्य: स्थानीय नाम ‘खेड़ा’ — इसीलिए ‘खेड़ा सभ्यता’; प्राचीन मालव प्रदेश का केन्द्र। जिला: टोंक। |
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बालाथल सभ्यता की विशेषताएँ? |
काल: ल. 3000–1500 ई.पू. (ताम्रपाषाण, आहड़-बनास संस्कृति); बाद में लौहयुगीन/आरंभिक ऐतिहासिक चरण। संरचना: 11 कमरों का विशाल दुर्गनुमा भवन; ताम्रपाषाणकालीन किलेबंदी के प्राचीनतम प्रमाणों में। नदी: कटार (कठार) — बेड़च की सहायक। जिला: उदयपुर (वल्लभनगर तहसील)। खोज-उत्खनन: खोज वी.एन. मिश्र (1962-63); उत्खनन वी.एन. मिश्र के निर्देशन में 1994–2000 (डेक्कन कॉलेज, पुणे + राजस्थान विद्यापीठ, उदयपुर)। |
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गिलूण्ड की विशेषताएँ |
युग: ताम्रपाषाण; आहड़-बनास संस्कृति (ल. 3000–1700 ई.पू.)। नदी: बनास। जिला: राजसमन्द। उत्खनन: बी.बी. लाल (1959-60; कई पुस्तकों में 1957-58); पुनः वसंत शिंदे व ग्रेगरी पोसेल — डेक्कन कॉलेज + पेन्सिलवेनिया वि.वि. (1999–2005)। |
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रंगमहल की विशेषताएँ |
स्थान: हनुमानगढ़ (घग्घर/सरस्वती-दृषद्वती घाटी)। काल: कुषाण-गुप्तकालीन संस्कृति (ल. 1ली–7वीं सदी ईस्वी); टीले पर बसाव-उजाड़ के तीन दौर। मृण्मूर्तियाँ: प्रसिद्ध ‘गुरु-शिष्य’ मृण्मूर्ति; कृष्ण-गोवर्धन (कृष्ण-लीला का प्राचीनतम साक्ष्य) फलक — परीक्षा-स्रोतों में ‘गांधार शैली से प्रभावित’ कहा जाता है। मृद्भाण्ड: लाल/गुलाबी, चाक-निर्मित, अलंकृत। सिक्के: 105 ताँबे के सिक्के — कुषाणकालीन व कुछ पूर्ववर्ती आहत (पंचमार्क)। धातु: काँसे-लोहे के उपकरण; ब्राह्मी अंकित मुहरें। खेती: चावल के साक्ष्य। उत्खनन: स्वीडिश अभियान — श्रीमती हन्ना रीड (Hanna Rydh), 1952-54। |
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भीनमाल की विशेषताएँ |
प्राचीन नाम: श्रीमाल। विदेशी सम्पर्क: रोमन एम्फोरा (मदिरा-पात्र), यूनानी शैली की दुहत्थी सुराही; शक-क्षत्रप सिक्के। अन्य: ब्रह्मगुप्त व महाकवि माघ की नगरी। उत्खनन: रत्नचन्द्र अग्रवाल (1953-54)। जिला: जालौर। |
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सुनारी (खेतड़ी) की विशेषताएँ |
स्थान: खेतड़ी तहसील, जिला झुंझुनूं। नदी: कांतली। महत्व: भारत की प्राचीनतम लोहा गलाने की भट्टियाँ (धौंकनी के प्रावधान सहित); लौहयुगीन हथियार; चावल-उपभोग के साक्ष्य; मातृदेवी मृण्मूर्ति। उत्खनन: राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग (1980-81)। |
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तिलवाड़ा की विशेषताएँ |
युग: मध्यपाषाण। नदी: लूनी। जिला: बालोतरा (पूर्व बाड़मेर)। उत्खनन: वी.एन. मिश्र (विजय कुमार व एल.एस. लेशनिक सहित), 1967-68। |
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बरोर, लोद्रवा, चंद्रावती की विशेषताएँ |
बरोर: प्राक्-हड़प्पा से परिपक्व सैन्धव स्थल; घग्घर (सरस्वती) क्षेत्र, अनूपगढ़ तहसील; जिला श्रीगंगानगर; ASI उत्खनन 2003 से; एक पात्र में ~8000 सेलखड़ी मनके। लोद्रवा: जैसलमेर से पूर्व भाटी राजवंश की मध्यकालीन राजधानी (1156 ई. में रावल जैसल ने राजधानी जैसलमेर स्थानांतरित की); काकनी/काकनेय (काक) नदी; पार्श्वनाथ जैन मंदिर प्रसिद्ध; जिला जैसलमेर। चंद्रावती: परमारों की नगरी (मुख्य अवशेष 10वीं-14वीं सदी); पश्चिमी बनास के तट पर (बस्ती-विस्तार सहायक सेवरनी घाटी में); आबू रोड, जिला सिरोही; उत्खनन 2013-18 (जे.एस. खरकवाल के नेतृत्व में, राजस्थान विद्यापीठ + राज्य पुरातत्व विभाग)। |
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जोधपुरा व गरदड़ा की विशेषताएँ |
जोधपुरा: काल ल. 2500 ई.पू.–200 ई. (OCP से शुंग-कुषाण तक 5 सांस्कृतिक चरण); गेरुए मृद्भाण्ड (OCP) व PGW; साबी नदी का तट; कोटपूतली तहसील — जिला कोटपूतली-बहरोड़ (पूर्व जयपुर); उत्खनन आर.सी. अग्रवाल व विजय कुमार (1972-73)। गरदड़ा: देश की प्राचीनतम ‘बर्ड राइडर’ रॉक पेंटिंग; छाजा (गरड़दा) नदी के किनारे; खोज स्थानीय अन्वेषक ओमप्रकाश शर्मा ‘कुक्की’ से सम्बद्ध; जिला बूंदी। |
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ओझियाना व बहज (डीग) की विशेषताएँ? |
ओझियाना: आहड़ (ताम्रपाषाण) संस्कृति का पहाड़ी ढलान पर बसा विशिष्ट स्थल; सफेद चित्रित काले-लाल मृद्भाण्ड; वृषभ मृण्मूर्तियाँ; खारी नदी; बदनौर तहसील — जिला ब्यावर (पूर्व भीलवाड़ा); उत्खनन बी.आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी (ASI), 1999-2000। बहज (जिला डीग): ASI का उत्खनन (जनवरी 2024 से, विनय गुप्ता के नेतृत्व में) — राजस्थान का अब तक का सबसे गहरा उत्खनन (~23 मी); 23 मी गहराई पर पुरा-नदी तल (palaeochannel), जिसे सरस्वती से जोड़ा जा रहा है; उत्तर-हड़प्पा से महाजनपद (शूरसेन), मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त कालों तक की परतें; 15 यज्ञ-कुंड; आरंभिक ब्राह्मी अंकित मिट्टी की मुहरें/सीलिंग; शिव-पार्वती मृण्मूर्तियाँ; मौर्यकालीन मातृदेवी मस्तक; अस्थि-उपकरण उद्योग; 800+ पुरावशेष। |
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सांभर की विशेषताएँ |
स्थान: जयपुर से ~60-65 किमी पश्चिम; काल: तीसरी सदी ई.पू.–10वीं सदी ई.। निवास: छह स्तरों में 45 घर (खुले आँगन, 3-4 कमरे, पत्थर की नींव, पके कवेलू की छतें)। मृद्भाण्ड: घड़े, सुराहियाँ; अलंकृत; सीप-शंख का प्रयोग। मूर्तियाँ: यक्ष-यक्षिणी, दुर्गा, भैरव, गन्धर्व। धातु: लोहा-ताँबा; चाँदी के आहत, हिन्द-यूनानी, कुषाण व यौधेय सिक्के; सोना मनकों/टुकड़ों के रूप में। उत्खनन: दयाराम साहनी (1936-38); प्रारम्भिक खुदाई हेण्डले (1884-85)। जिला: जयपुर। |
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सोथी, तरखानवाला डेरा आदि के प्रमाण कहाँ से |
‘कालीबंगा प्रथम’: सोथी सभ्यता (जिला बीकानेर) — अमलानन्द घोष द्वारा खोजी गई; प्राक्-हड़प्पा (सोथी) संस्कृति। तरखानवाला डेरा (अनूपगढ़ तहसील, श्रीगंगानगर): परीक्षा-परम्परा में ‘आर्य सभ्यता के प्रमाण’; ASI के अनुसार घग्घर तट का हड़प्पाकालीन स्थल (उत्खनन पी.के. त्रिवेदी, 2003-04)। नोट: भटनेर (हनुमानगढ़) की ‘महिषासुरमर्दिनी मूर्ति’ व बरवाला की ‘जीवन्त स्वामी मूर्ति’ सम्बन्धी कथन अपुष्ट हैं — बिना स्रोत-सत्यापन प्रकाशित न करें। |
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ताम्र-भण्डार व बैराठ के अतिरिक्त बौद्ध स्थल |
ताम्र-भण्डार स्थल: झाड़ोल (उदयपुर), कुराड़ा (परबतसर, नागौर), साबणिया (बीकानेर), नन्दलालपुरा (जयपुर), पिण्ड-पाडलिया (चित्तौड़गढ़)। अन्य बौद्ध स्थल: लालसोट (दौसा — शुंगकालीन बौद्ध अवशेष), शेरगढ़ (बारां — परवन नदी तट), नगरी (चित्तौड़गढ़)। |
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पुरापाषाण/लघुपाषाण/लूनी घाटी के प्रमुख स्थल |
पूर्वपाषाण हस्तकुठार (सर्वप्रथम): जयपुर व इन्द्रगढ़ से — सी.ए. हैकेट (1870 ई., भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण)। मध्य पुरापाषाण (लूनी घाटी): लूनी व सहायक नदियों का क्षेत्र; डीडवाना (जिला डीडवाना-कुचामन) व बूढ़ा पुष्कर (अजमेर)। जालोर से पूर्व-पाषाण उपकरण: बी. आल्चिन (Bridget Allchin)। लघुपाषाण/मध्यपाषाण स्थल: बागोर (भीलवाड़ा) व तिलवाड़ा (बालोतरा)। (‘सोजत, मनेरी’ के उल्लेख अपुष्ट हैं।) |
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23 |
प्रथम सर्वेक्षण, शिलालेख-खोज, कालीबंगा-खोज व विभाग-गठन |
प्रथम पुरातात्विक सर्वेक्षण (1871): ए.सी.एल. कार्लाइल — दौसा क्षेत्र से पाषाण उपकरण व मानव-अस्थियों की सूचना। भाब्रू लघु शिलालेख: कैप्टन बर्ट (1837), बैराठ की बीजक पहाड़ी से; अब एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता। कालीबंगा: प्रथम पहचान एल.पी. टेस्सीटोरी (1916-18); 1952 में अमलानन्द घोष द्वारा हड़प्पाई स्थल के रूप में चिह्नित। बैराठ उत्खनन-प्रतिवेदन: दयाराम साहनी। पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, राजस्थान: गठन 1950 (कुछ उत्तर-कुंजियों में 1949)। |
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मृद्भाण्ड संस्कृतियाँ किन स्थलों से? |
गेरुए मृद्भाण्ड (OCP): गणेश्वर, जोधपुरा। काले-लाल मृद्भाण्ड (BRW): आहड़, नोह, ओझियाना। चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (PGW): नोह, जोधपुरा (बैराठ से भी टुकड़े प्राप्त)। उत्तरी काली पालिशदार मृद्भाण्ड (NBPW): बैराठ (प्रमुख स्थल), नोह; हाल में बहज (डीग) से भी। |
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काल/संस्कृति आधारित स्थल-वर्गीकरण? |
महाभारतकालीन परम्परा से सम्बद्ध: बैराठ (विराटनगर), नोह, बहज। मौर्यकालीन: बैराठ, बहज। सैन्धव (सिन्धु घाटी): कालीबंगा, बरोर, तरखानवाला डेरा। आहड़-बनास ताम्रपाषाण संस्कृति: आहड़, गिलूण्ड, बालाथल, ओझियाना। PGW: नोह, जोधपुरा। लघुपाषाण (मध्यपाषाण): बागोर, तिलवाड़ा। |
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प्रमुख स्थलों के जिले एवं नदियाँ (सारांश)? |
कालीबंगा (हनुमानगढ़ — घग्घर/सरस्वती); आहड़ (उदयपुर — आयड़/बेड़च); गणेश्वर (सीकर — कांतली); बैराठ (कोटपूतली-बहरोड़ — बाणगंगा); नोह (भरतपुर — रूपारेल); बागोर (भीलवाड़ा — कोठारी); बालाथल (उदयपुर — कटार); गिलूण्ड (राजसमन्द — बनास); रैढ़ (टोंक — ढील); नगरी (चित्तौड़गढ़ — बेड़च); रंगमहल (हनुमानगढ़ — घग्घर); भीनमाल (जालौर); सुनारी (झुंझुनूं — कांतली); तिलवाड़ा (बालोतरा — लूनी); जोधपुरा (कोटपूतली-बहरोड़ — साबी); गरदड़ा (बूंदी — छाजा); ओझियाना (ब्यावर — खारी); बरोर (श्रीगंगानगर — घग्घर/सरस्वती); लोद्रवा (जैसलमेर — काकनी/काकनेय); चंद्रावती (सिरोही — पश्चिमी बनास); बहज (डीग); भटनेर (हनुमानगढ़); नगर (टोंक); सांभर (जयपुर)। |
10. मृद्भांड (पॉटरी) परंपराएँ
TABLE 11: राजस्थान की प्रमुख मृद्भांड-परंपराएँ
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मृद्भांड-परंपरा |
विशेषता/सम्बद्ध स्थल |
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काला-व-लाल मृद्भांड (BRW) |
उल्टी भट्टी में पकाए जाने के कारण दो रंगों में; नोह, आहड़, गिलुंड, बालाथल, बैराठ आदि स्थलों से प्राप्त |
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चित्रित धूसर मृद्भांड (PGW) |
उत्तर भारत में महाभारतकालीन मानी जाने वाली परंपरा; जोधपुरा, नोह, सुनारी आदि से प्राप्त |
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कुषाणकालीन मृद्भांड |
गुलाबी रंग, चाक-निर्मित, उन्नत तकनीक; नोह, सुनारी, जोधपुरा से प्राप्त |
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उत्तरी काली पॉलिश्ड मृद्भांड (NBPW) |
काली चमकदार पॉलिशयुक्त, मौर्यकालीन उत्तम मृद्भांड; बैराठ, जोधपुरा से प्राप्त |
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गुप्त-कुषाणकालीन रंगमहल मृद्भांड |
लाल-श्वेत बर्तन; श्रीनगर (जालौर) व रंगमहल (हनुमानगढ़) से प्राप्त |
11. अन्य उल्लेखनीय पुरास्थल
TABLE 12: राजस्थान के कुछ अन्य महत्वपूर्ण पुरास्थल
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स्थल (जिला) |
विशेषता |
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चंद्रावती |
सिरोही (आबूरोड़ के निकट); परमार वंश की राजधानी; मारवाड़ क्षेत्र का प्रमुख अन्न-भंडार ('कोलार') |
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श्रीनगर |
जालौर (भीनमाल के निकट); रंगमहल/गुप्त-कुषाणकालीन संस्कृति; श्वेत मिट्टी के बर्तन; उत्खनन 1953-54 |
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जूनाखेड़ा |
पाली; लूनी बेसिन में स्थित; मौर्य-गुप्त-कुषाणकालीन सांस्कृतिक स्तर |
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ईसवाल |
उदयपुर; औद्योगिक बस्ती; मृत्तिका-खण्ड व लौह-प्रगलन के प्रमाण; कुषाणकालीन |
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भीनमाल |
जालौर; लूनी बेसिन; उत्खनन 1953-54, रत्नचंद्र अग्रवाल द्वारा |
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डीडवाना, जायल |
नागौर; निम्न पुरापाषाणकालीन राजस्थान के सबसे प्राचीन स्थलों में गिने जाते हैं; यायावर (घुमंतू) जीवन-शैली के प्रमाण |
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अन्य ताम्रयुगीन स्थल |
पिण्डपाड़लिया, झाड़ोल, कुराड़ा, साबनिया, पूगल, एलाना, बूढ़ा पुष्कर, कोल |
12. शैलाश्रय एवं शैल चित्र (Rock Shelters & Rock Paintings)
TABLE 13: शैल चित्रों से जुड़े प्रमुख तथ्य
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पक्ष |
विवरण |
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खोज |
वी.एस. वाकणकर द्वारा 1953 में कोटा (चंबल घाटी) व झालावाड़ (गागरोन, अलनिया नदी क्षेत्र) में |
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प्रमुख स्थल |
चंबल नदी घाटी, बूँदी, भरतपुर क्षेत्र; गणेश्वर के निकट रॉक-पेंटिंग; कुराड़ा; बैराठ की गुहाओं में भी शैल-चित्र मिले हैं |
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विषय-वस्तु |
मानव व पशु-आकृतियाँ; आखेट व नृत्य के दृश्य; ज्यामितीय चिह्न |
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प्रयुक्त रंग |
मुख्यतः लाल-गेरू (हेमाटाइट) व श्वेत — प्राकृतिक खनिज रंगों से निर्मित |
13. संस्कृति-काल के अनुसार प्रमुख पुरातात्विक स्थलों की सार-
TABLE 14: संस्कृति-काल, प्रमुख स्थल एवं जीवन-शैली — एक दृष्टि में
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संस्कृति-काल |
प्रमुख स्थल |
जीवन-शैली की मुख्य विशेषता |
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पुरापाषाण |
डीडवाना (सबसे प्राचीन), जायल, भानगढ़, इन्द्रागढ़, झालावाड़, बूढ़ा पुष्कर, होकरा बेसिन |
यायावर (घुमंतू) जीवन; आखेट व खाद्य-संग्रहण |
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मध्यपाषाण (माइक्रोलिथ) |
बागोर, तिलवाड़ा, विराटनगर, सोजत, धनेरी |
पशुपालन का आरंभ; आखेट व खाद्य-संग्रहण |
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नवपाषाण |
(सीमित प्रत्यक्ष प्रमाण) |
बस्तियों में स्थायी जीवन का आरंभ; चाक-निर्माण |
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ताम्रपाषाण |
आहड़, गिलुंड, कालीबंगा, झर (जयपुर), किराड़ोत, बूढ़ा पुष्कर, पलाना, ओझियाना, बालाथल |
कृषि-आधारित स्थायी जीवन; मृद्भांड व ताँबे का प्रयोग |
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ताम्रयुगीन |
गणेश्वर, बेणेश्वर, जोधपुरा, नन्दलालपुरा, साबनिया, परबतसर |
पूर्णतः स्थायी जीवन |
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लौहयुगीन |
नोह, विराटनगर, जोधपुर, सांभर, सुनारी, रैढ़, नगर |
विविध धातु-उपकरणों का प्रयोग |
14. पुरातात्विक स्थल, उत्खनन वर्ष एवं अनुसंधानकर्ता
TABLE 15: प्रमुख पुरास्थल — उत्खनन वर्ष एवं सम्बद्ध विद्वान
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स्थल |
उत्खनन वर्ष |
अनुसंधानकर्ता |
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इन्द्रागढ़ (जयपुर) |
1870 |
सी.ए. हैकेट |
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दौसा |
1871 |
ए.सी.एल. कार्लाइल |
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झालावाड़ |
1928 |
सेटन कर |
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नगरी (चित्तौड़गढ़) |
1904, 1915-16, 1962 |
कार्लाइल, भण्डारकर, सौन्दरराजन |
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कुराड़ा (परबतसर) |
1934 |
पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग |
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विराटनगर/बैराठ |
1936-37, 1962-63 |
कनिंघम, कार्लाइल, डी.आर. भण्डारकर, दयाराम साहनी, नीलरत्न बनर्जी, कैलाशनाथ दीक्षित |
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रैढ़ (टोंक) |
1938-40 |
दयाराम साहनी, केदारनाथ पुरी |
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कालीबंगा (हनुमानगढ़) |
1952-53 (पहचान), 1960-69 (उत्खनन) |
अमलानंद घोष, बी.बी. लाल, बी.के. थापर, जे.पी. जोशी, एम.डी. खरे |
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रंगमहल/बड़ोपल (हनुमानगढ़) |
1952-54 |
कार्लाइल, टॉड, टेस्सीटोरी, ऑरेल स्टाइन, ए. घोष |
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आहड़ (उदयपुर) |
1953, 1954, 1961-62 |
एच.डी. साँकलिया, अक्षयकीर्ति व्यास, आर.सी. अग्रवाल, वी.एन. मिश्र |
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जोधपुरा (जयपुर) |
1972-73 |
रत्नचंद्र अग्रवाल, विजय कुमार |
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भीनमाल (जालौर) |
1953-54 |
रत्नचंद्र अग्रवाल |
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गिलुंड (राजसमंद) |
1957-58 |
बी.बी. लाल, वी.एस. शिंदे, ग्रेगरी पोसेल |
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नोह (भरतपुर) |
1963-64 |
रत्नचंद्र अग्रवाल, विजय कुमार |
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बागोर (भीलवाड़ा) |
1967-69 |
वी.एन. मिश्र, विजय कुमार, एल.एस. लैशनिक |
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तिलवाड़ा (बाड़मेर) |
1967-68 |
राज्य पुरातत्व विभाग, डेक्कन कॉलेज |
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गणेश्वर (सीकर) |
1977-79 |
रत्नचंद्र अग्रवाल, विजय कुमार |
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सुनारी (सीकर) |
1980 |
राजस्थान पुरातत्व विभाग |
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बालाथल (उदयपुर) |
1993-2000 |
वी.एन. मिश्र, वी.एस. शिंदे, ए.के. मोहंती, ग्रेगरी पोसेल |
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ओझियाना (भीलवाड़ा) |
1999-2000 |
बी.आर. मीणा, एस.सी. गुप्ता, आलोक त्रिपाठी |
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सौंथी (बीकानेर) |
1942-43, 1950-53 |
एल.पी. टेस्सीटोरी, ऑरेल स्टाइन, अमलानंद घोष |
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बरोर (अनूपगढ़) |
2003-04 |
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण |
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जायल (नागौर) |
1871-72 |
कार्लाइल, दयाराम साहनी |
15. त्वरित पुनरावृत्ति बिंदु
TABLE 16: याद रखने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य
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तथ्य |
उत्तर |
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सबसे प्राचीन पुरास्थल |
डीडवाना (नागौर) |
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पशुपालन का प्राचीनतम साक्ष्य |
बागोर (भीलवाड़ा), लगभग 5000 ई.पू. |
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'भारत का टाटानगर' |
रैढ़ (टोंक) |
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'ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी' |
राजस्थान/गणेश्वर |
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सर्वाधिक प्राचीन लौह-भट्टियाँ |
सुनारी (सीकर) |
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सर्वाधिक आहत मुद्राएँ (लगभग 3075) |
रैढ़ (टोंक) |
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BRW (काला-व-लाल मृद्भांड) के प्रमुख स्थल |
आहड़, गिलुंड, नोह, बालाथल |
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मालव सिक्के (लगभग 6000) |
नगर/कर्कोट (टोंक) |
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आहड़ का प्राचीन नाम |
ताम्रवती नगरी/आघाटपुर/धूलकोट |
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बालाथल का प्राचीन नाम |
ताम्रवती |
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बैराठ — मत्स्य जनपद की राजधानी |
अशोक का भाब्रू शिलालेख; बौद्ध स्तूप |
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'लूनी उद्योग' का नामकरण |
वी.एन. मिश्र |
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'बागोर संस्कृति' का नामकरण |
एच.डी. साँकलिया/वी.एन. मिश्र |
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कालीबंगा नाम की उत्पत्ति |
काले रंग की (टेराकोटा) चूड़ियों से |
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विश्व का प्राचीनतम जुताई किया खेत |
कालीबंगा |
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कालीबंगा को हड़प्पा-स्थल के रूप में पहचानने वाले |
अमलानंद घोष |