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काल / संस्कृति एवं प्रमुख स्थल
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सामाजिक व्यवस्था एवं जीवन शैली
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धार्मिक, कलात्मक एवं सांस्कृतिक विशेषताएं (कला, प्रथाएं, लिपि)
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आर्थिक गतिविधियाँ, उद्योग एवं तकनीक
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1. पुरापाषाण
काल (Palaeolithic Era)
• स्थल: डीडवाना, जायल, भानगढ़, इन्द्रगढ़, दर,
पुष्कर (होकड़ा बेसिन); चम्बल, बनास,
बेड़च, गंभीरी, वागन
घाटियाँ।
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• पूर्ण रूप
से
यायावरी (घुमक्कड़) जीवन
था।
• मानव
मुख्य रूप
से
आखेटक (शिकारी) व
खाद्य संग्राहक की
भूमिका में
था।
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• मानव को
आग
जलाना ज्ञात हो
चुका
था।
• वह
पहिये के
उपयोग से
पूरी
तरह
अपरिचित था।
• प्राकृतिक गुफाओं व
शैलाश्रयों में
निर्मित शैलचित्रों में
शिकार (आखेट)
के
दृश्य प्रमुख हैं।
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• मानव पूर्णतः प्रस्तर (पत्थर) के
उपकरणों पर
निर्भर था।
• नदी
घाटियों में
क्वार्ट्जाइट पत्थर से
निर्मित भारी
उपकरण जैसे
हैण्डएक्स (हस्तकुठार), क्लीवर और
चॉपर-चॉपिंग प्रयुक्त होते थे।
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2. मध्यपाषाण
काल (Mesolithic Era)
• स्थल: बागौर (भीलवाड़ा-कोठारी नदी), तिलवाड़ा (बालोतरा-लूनी
बेसिन), विराटनगर, सोजत,
धनेरी।
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• मानव यायावरी से
स्थायी निवास की
ओर
बढ़ने लगा
था।
• इसके
साक्ष्य के
रूप
में
३-५ मीटर व्यास की
गोलाकार झोपड़ियाँ और
राख/कोयले से युक्त चूल्हे मिले
हैं।
• जीवन
शैली
में
मिश्रित अर्थव्यवस्था की
ओर
संक्रमण शुरू
हुआ।
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• इस काल
में
विकसित शवाधान पद्धति प्रचलित थी,
जिसमें शवों
को
दक्षिण-पूर्व से
उत्तर-पश्चिम दिशा
में
पैर
मोड़कर लिटाया जाता
था।
• लोग
आत्मा के
आवागमन में
विश्वास रखते
थे,
इसलिए शवों
को
मोती,
तांबे के
लटकन,
मनकों, बर्तनों और
भोजन-पानी के साथ
दफ़नाया जाता
था।
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• बागौर और
तिलवाड़ा से
कृषि
व
पशुपालन के
प्राचीनतम साक्ष्य (लगभग
५०००
ई.पू.) प्राप्त होते
हैं,
जहाँ
भेड़,
बकरी,
गाय,
बैल
की
हड्डियाँ मिली
हैं।
• तकनीक के
क्षेत्र में
'लघु
पाषाणोपकरण' (माइक्रोलिथ्स) का
उदय
हुआ,
जिसमें चर्ट/क्वार्ट्ज के १-४
सेमी
के
छोटे
ज्यामितीय औजार
(त्रिकोण, अर्द्धचंद्राकार, बेधनी, समलम्ब) बनाए
जाते
थे।
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3. उत्तर
/ नवपाषाण काल (Neolithic Era)
• राजस्थान में नवपाषाण काल नहीं पाया जाता है
भारत के
प्रमुख स्थल: बुर्जहोम व गुफकराल (कश्मीर), मेहरगढ़ (बलूचिस्तान), चिरांद (बिहार), कोल्डीहवा व महागड़ा (उत्तर प्रदेश)।
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• कृषि-पशुपालन के अधिशेष (surplus) से स्थायी बस्तियाँ व प्रारंभिक सामाजिक वर्गीकरण हुआ।
•
व्यवसाय-आधारित कार्य-विभाजन शुरू; Note: औपचारिक जाति-व्यवस्था वैदिक कालीन है।
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• मानव पहिये के
आविष्कार (चाक
निर्माण) से
परिचित हो
गया
था।
• पहले
हाथ
से
और
फिर
चाक
से
बर्तनों का
निर्माण शुरू
हुआ।
•
प्रसिद्ध पुरातत्वविद वी. गॉर्डन चाइल्ड (V. Gordon Childe) ने इस युग में हुए सामाजिक-आर्थिक व तकनीकी परिवर्तनों के कारण इसे "नवपाषाण कालीन क्रांति" (Neolithic Revolution) कहा है।
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•
इस काल में गेहूं, जौ और कपास की खेती (जैसे मेहरगढ़ में) तथा चावल का उत्पादन (जैसे कोल्डीहवा में) प्रारंभ हुआ।
• उपकरणों का
आकार
और
अधिक
छोटा,
पैना
तथा
कौशल
से
भरपूर हो
गया
था।
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4. ताम्र
एवं ताम्र-पाषाणिक संस्कृतियां (Chalcolithic Cultures)
• स्थल: गणेश्वर (नीमकाथाना), आहड़ (उदयपुर), बालाथल, गिलूंड (राजसमंद), ओझियाना (भीलवाड़ा), पछमता आदि।
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• आहड़: मकान
चौकोर और
पत्थरों की
नींव
पर
मिट्टी या
धूप
में
सुखाई ईंटों से
बनते
थे।
एक
मकान
में
४
से
६
बड़े
चूल्हे मिलना वृहद्/संयुक्त परिवार या
सामूहिक भोजन
व्यवस्था को
दर्शाता है।
• बालाथल: उत्खनन में ११ कमरों का
एक
भव्य
भवन
और
एक
विशाल "दुर्ग स्वरूप संरचना" मिली है, जो
सुदृढ़ सामाजिक संगठन की
प्रतीक है।
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• मृद्भाण्ड
कला: आहड़ के लोग
'कृष्ण-लोहित' (काले
और
लाल
- BRW) मिट्टी के
बर्तन काम
में
लेते
थे,
जिन
पर
सफ़ेद रंग
से
चित्रांकन होता
था।
अनाज
रखने
के
बड़े
मृद्भाण्डों को
स्थानीय भाषा
में
'गोरे व कोठ' कहा जाता था।
गणेश्वर से
गैरिक (कपिशवर्णी) मृद्भाण्ड तथा
गिलूंड से
ज्यामितीय व
प्राकृतिक अलंकरण वाले
पात्र मिले
हैं।
ओझियाना की
पहाड़ी से
गाय
व
वृषभ
की
मृण्मय मूर्तियाँ प्राप्त हुई
हैं।
• शवाधान: आहड़ में शवों
को
कपड़ों और
आभूषणों सहित
उत्तर की
ओर
सिर
रखकर
गाड़ते थे।
बालाथल में
'योगी
मुद्रा' में
शवाधान के
साक्ष्य मिले
हैं।
• विशिष्ट साक्ष्य: बालाथल से प्राप्त ४०००
वर्ष
पुराना मानव
कंकाल भारत
में
'कुष्ठ रोग का सबसे पुरातन प्रमाण' माना जाता है।
पछमता से
कलात्मक नक्काशीयुक्त जार
और
अफ़गानिस्तानी 'लेपिस लेजुली' (नील
का
बहुमूल्य पत्थर) मिला
है।
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• ताम्र
धातु कर्म: गणेश्वर संस्कृति को "भारत
में ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी" माना जाता है,
जहाँ
से
प्राप्त आयुधों में
९९%
शुद्ध तांबा है।
आहड़
के
लोग
तांबा गलाना जानते थे,
जहाँ
तांबा गलाने की
भट्टी और
६
तांबे की
कुल्हाड़ियाँ मिली
हैं।
• व्यापार व विदेशी संबंध: आहड़ में रंगाई-छपाई
के
ठप्पे और
यूनानी मुद्राएँ मिली
हैं।
बिना
हत्थे का
जलपात्र ईरान
व
बलूचिस्तान से
व्यापारिक संबंध दर्शाता है।
कुराड़ा (परबतसर) से
प्राप्त 'प्रणालयुक्त अर्घ्यपात्र' का
संबंध ईरान
से
माना
गया
है।
• अन्य तकनीक: बालाथल के लोग कपड़ा बुनना जानते थे।
आहड़
में
गंदे
पानी
के
शांतिपूर्ण निकास के
लिए
वैज्ञानिक 'चक्रकूप (शोषण पात्र घड़े) पद्धति' अपनाई जाती थी। गणेश्वर में
कांतली नदी
की
बाढ़
रोकने हेतु
पत्थरों के
बांध
बनाए
गए
थे।
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5. कांस्य
युग / हड़प्पा संस्कृति (Bronze Age / Indus Valley)
• स्थल: कालीबंगा (हनुमानगढ़), रंगमहल, बरोर (अनूपगढ़) आदि।
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• सुनियोजित
नगर प्रबंधन: कालीबंगा का नगर दो
भागों में
विभक्त था—विशिष्ट वर्ग हेतु 'पश्चिमी दुर्ग' तथा
सामान्य जनता
हेतु
'पूर्वी निचला नगर'। दोनों भाग
कच्ची ईंटों की
सुदृढ़ रक्षा प्राचीर (किलेबंदी) से
घिरे
थे।
सड़कें ग्रिड पैटर्न पर
एक-दूसरे को समकोण पर
काटती थीं।
• आवास व्यवस्था: मकान कच्ची व
पक्की ईंटों से
निर्मित थे,
जिनमें दालान, ४-५ कमरे, कुएँ
और
चबूतरे होते
थे।
फर्श
को
चिकनी मिट्टी से
लीपा
जाता
था
और
छतें
लकड़ी की
बल्लियों व
मिट्टी से
बनती
थीं।
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• धार्मिक
कृत्य: इस सभ्यता में
मातृदेवी की
मूर्ति का
पूर्ण अभाव
है।
दुर्ग के
दक्षिणी भाग
में
चबूतरे पर
एक
ही
पंक्ति में
७ आयताकार 'अग्निकुंड / अग्निवेदियाँ' मिली हैं, जिनमें पशुओं की
हड्डियाँ व
राख
थी।
• अंत्येष्टि व शल्य चिकित्सा: अंत्येष्टि की तीनों विधियाँ (पूर्ण समाधीकरण, आंशिक समाधीकरण, दाह
संस्कार) प्रचलित थीं।
यहाँ
से
युगल
शवाधान व
अंडाकार कब्रें मिली
हैं।
एक
बच्चे के
कपाल
में
६
छिद्र मिले
हैं,
जिसे
जलशीर्ष बीमारी के
इलाज
हेतु
की
गई
'ट्रेफीनेशन' (शल्य क्रिया) का विश्व में प्राचीनतम उदाहरण माना
जाता
है।
• कला व लिपि: सैन्धव लिपि का प्रयोग होता
था,
जो
अक्षरों की
ओवरलैपिंग के
आधार
पर
'दाएँ
से
बाएँ'
(ब्यूस्ट्रोफेदन) लिखी
जाती
थी।
कलाकृतियों में
कांसे के
दर्पण, हाथी
दाँत
का
कंघा,
सोने-मूँगे के आभूषण और
मिट्टी की
अनूठी वृषभाकृति (धड़
से
अलग
होने
वाला
सिर)
शामिल हैं।
बेलनाकार मुहरें मेसोपोटामिया जैसी
हैं।
• रंगमहल: यहाँ कुषाण व
उत्तर-कुषाण कालीन गांधार व
मथुरा शैलियों के
समन्वय से
निर्मित अद्वितीय मृदाफलक (जैसे
गोवर्धनधर कृष्ण, शिव-पार्वती) प्राप्त हुए हैं।
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• कृषि
व पशुपालन: संसार भर में 'जुते हुए खेत' का पहला और प्राचीनतम साक्ष्य कालीबंगा से
मिला
है,
जहाँ
ग्रिड पैटर्न पर
एक
साथ
दो
फसलें (चना
+ सरसों) उगाई
जाती
थीं।
यहाँ
से
ऊँट
व
पालतू कुत्ते के
साक्ष्य मिले
हैं।
• तकनीकी नवाचार: विश्व में सर्वप्रथम 'लकड़ी की नाली' के अवशेष और
अलंकृत ईंटों का
प्रयोग यहीं
मिला
है।
बर्तनों को
बनावट व
रंग
के
आधार
पर
६
उपभागों (मटका,
थाली,
कटोरा आदि)
में
विभाजित किया
गया
था।
• आपदा व अन्य स्थल: उत्खनन से २६०० ई.पू. के भूकंप का
विश्व में
प्राचीनतम साक्ष्य मिला
है,
जो
इस
सभ्यता के
विनाश का
कारण
बना।
बरोर से
बटन के आकार की मुहरें और
सेलखड़ी के
लगभग
८०००
मनके
प्राप्त हुए
हैं।
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6. लौहयुगीन
संस्कृति एवं ऐतिहासिक काल (Iron Age & Historical Period)
• स्थल: नोह (भरतपुर), जोधपुरा (कोटपूतली-बहरोड़), सुनारी (नीमकाथाना), विराटनगर (बैराठ), रैढ़
(टोंक),
नगर
(टोंक),
भीनमाल (जालौर), ईसवाल (उदयपुर), नलियासर (सांभर)।
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• ऐतिहासिक
नगर: विराटनगर मत्स्य देश की प्राचीन राजधानी थी,
जहाँ
पाण्डवों ने
अज्ञातवास का
अंतिम वर्ष
बिताया था;
यहाँ
'कीचक
का
महल'
व
'भीमताल' जैसे
अवशेष स्थित हैं।
• आदि आर्यों का जीवन: घग्घर उपत्यका, नोह व जोधपुरा में
विकसित 'चित्रित सलेटी मृद्भाण्ड (PGW)' संस्कृति को
आदि
आर्यों की
संस्कृति माना
गया
है।
ये
लोग
साधारण मकानों में
रहते
थे
तथा
इनका
आहार
चावल,
गोमांस व
घोड़े का
मांस
था।
रथों
को
खींचने हेतु
घोड़ों का
उपयोग किया
जाता
था।
• सुनारी व रैढ़: सुनारी शेखावाटी का धन-धान्य संपन्न कृषि
क्षेत्र था।
रैढ़
से
आलीशान इमारतों, समानांतर दीवारों, नालियों और
दुमंजिले मकानों के
अवशेष मिले
हैं;
यहाँ
के
लोग
बारीक वस्त्र (सूती
कपड़ा) निर्माण में
सिद्धहस्त थे।
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• मृद्भाण्ड
कला: चित्रित धूसर मृद्भाण्ड (PGW) इस काल
की
मुख्य पहचान हैं।
नोह
से
प्राप्त एक
बर्तन पर
स्वास्तिक चिह्न और
गौरैया का
खिलौना मिला
है
जो
सम्पूर्ण भारत
में
अनूठा है।
मौर्य काल
में
'उत्तरी काली
पॉलिश युक्त मृद्भाण्ड (NBPW)' और शुंग-कुषाण काल में चाक
निर्मित काले
बर्तन व
संकल्प संबंधी जलपात्र प्रचलित थे।
• बौद्ध व वैदिक मत:
१.
विराटनगर: मौर्य काल में बौद्ध धर्म
का
प्रमुख केंद्र था,
जहाँ
बीजक
की
पहाड़ी से
भारत
का
प्राचीनतम 'गोलाकार बौद्ध चैत्य (हीनयान संप्रदाय)' व विहार मिले
हैं।
यहाँ
से
बुद्ध के
अस्थि अवशेष युक्त 'स्वर्ण मंजूषा' और सम्राट अशोक
का
भाब्रू शिलालेख (बैराठ-कलकत्ता अभिलेख) मिला
है
जो
उनकी
बौद्ध धर्म
में
निष्ठा दर्शाता है।
२.
नोह व नगर: नोह से 'श्पाप हत्तस' अंकन
वाली
मुद्रा (वैदिक पुनर्स्थापना का
प्रतीक) तथा
प्रस्तर कला
की
प्राचीनतम यक्ष
प्रतिमा ('जाख बाबा') प्राप्त हुई है। नगर
से
गुप्तोत्तर कालीन स्लेटी पत्थर की
महिषासुरमर्दिनी की
मूर्ति प्राप्त हुई
है।
• लिपि विज्ञान: बैराठ की कंदराओं से
रहस्यमयी 'शंख लिपि / कूट लिपि' (गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि का अत्यधिक अलंकृत रूप)
के
प्रचुर प्रमाण तथा
अशोककालीन ब्राह्मी लिपि
युक्त ईंटें मिली
हैं।
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• लौह धातु
कर्म: सुनारी और जोधपुरा से
अयस्क से
लोहा
प्राप्त करने
वाली
भारत
की
प्राचीनतम 'धमन भट्टियाँ और धौंकनी' मिली हैं, जिनसे भट्टी के
तापक्रम पर
नियंत्रण रखा
जाता
था।
ईसवाल (उदयपुर) से
५वीं
शताब्दी ईसा
पूर्व से
मध्यकाल तक
(लगभग
२०००
वर्ष)
निरंतर लोहा
गलाने के
साक्ष्य, लौह-मल व पाइप
प्राप्त हुए
हैं।
• सिक्कों का विशाल भंडार (टाटानगर): टोंक के 'रैढ़'
नामक
स्थल
को
इसके
विपुल लौह
भंडार और
सिक्कों के
विशाल संग्रह के
कारण
"प्राचीन राजस्थान का टाटानगर" कहा जाता है।
यहाँ
से
३०७५
आहत
(पंचमार्क) सिक्के, ३००
मालव
जनपद
के
सिक्के और
यूनानी राजा
अपोलोडोट्स का
खंडित सिक्का मिला
है।
• मुद्रा प्रणाली: विराटनगर से सूती कपड़े में
बंधी
३६
मुद्राएँ मिलीं (८
पंचमार्क चांदी की
+ २८
इंडो-ग्रीक, जिनमें १६ मुद्राएँ यूनानी राजा
मिनेण्डर की
हैं)। नलियासर (सांभर) से
कुषाणकालीन १०५
ताम्र मुद्राएँ, हुविष्क व
सासासनियन सिक्के प्राप्त हुए
हैं।
विराटनगर में
अकबर
व
जहांगीर कालीन मुगल
टकसाल के
प्रमाण मिले
हैं।
• विदेशी प्रभाव: भीनमाल (जालौर) से रोमन 'एम्फोरा' (यूनानी दुहत्थी सुराही) की प्राप्ति और
शक
क्षत्रपों के
सिक्के मिले
हैं
जो
तत्कालीन विदेशी व्यापार को
प्रमाणित करते
हैं।
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